Sunday, 14 January 2018

ग़ज़ल-रुसवा करके।



















रुसवा करके वो हमें छोड़ गए हैं,
हरे पत्तों को वो तोड़ गए हैं।

गुलाब तोड़ गए वो अपने हिस्से का,
मेरे लिए काँटों को छोड़ गए हैं।

कोई सीधा रास्ता अब नहीं मिलता मुझे,
इस तरह वो रास्तों को मोड़ गए हैं।

आज लिखने में कुछ दर्द हो रहा है,
मेरे हाथों को आज वो मरोड़ गए हैं।

©नीतिश तिवारी।

2 comments:

  1. आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल सोमवार (15-01-2018) को "डोर पर लहराती पतंगें" (चर्चा अंक-2849)) पर भी होगी।
    --
    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
    --
    हर्षोंल्लास के पर्व लोहड़ी और मकर संक्रान्ति की
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    राधातिवारी (राधेश्याम)

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    1. मेरी रचना शामिल करने के लिए धन्यवाद।

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