Friday, 9 September 2016

फिर से मोहब्बत का हिसाब।




एक आँधी आयी और जलता हुआ वो चिराग बुझ गया।
लो फिर से आज मोहब्बत का हिसाब हो गया।।

तेरी यादों के जलते धुएँ से कैसे अपने आप को संभालूं।
आंसुओं का सहारा लूँ या समंदर को पास बुला लूँ।

©नीतिश तिवारी।


2 comments:

  1. आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल रविवार (11-09-2016) को "प्रयोग बढ़ा है हिंदी का, लेकिन..." (चर्चा अंक-2462) पर भी होगी।
    --
    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
    --
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

    ReplyDelete
    Replies
    1. मेरी प्रस्तुति शामिल करने के लिए आपका धन्यवाद।

      Delete