Wednesday, 13 January 2016

My letter to Modi ji.




आदरणीय,

                श्री नरेन्द्र मोदी जी,
                प्रधानमंत्री,
               भारत गणराज्य।

               सादर प्रणाम।


                                आज अपने विचारों को इस पत्र के माध्यम से आप तक पहुँचाने में मुझे अत्यधिक प्रसन्नता महसूस हो रही है या यूँ कहें कि अपने आप को सौभाग्यशाली महसूस कर रहा हूँ। मैं उम्मीद करता हूँ कि मेरा ये पत्र आप तक पहुँच जाये।


इस बार के ' मन की बात ' कार्यक्रम में जिस तरह से आपने भारत के नागरिकों से सुझाव पर विशेष जोर दिया था, और देश के विकास में युवाओं के योगदान पर बल दिया था, उसी कड़ी में ये पत्र आपको लिख रहा हूँ।


अपनी बेहतरीन प्रतिभा और कार्यकुशलता से जिस तरह से आप प्रधानमंत्री पद की जिम्मेदारी का निर्वाह कर रहे हैं, उससे करोड़ों लोगों की तरह मैं भी आपका मुरीद हो गया हूँ। इसी कड़ी में मैं आपको यह बताना चाहूँगा कि कुछ लोग मुझे 'अँधा मोदी भक्त ' के नाम से भी सम्बोधित करते हैं और मुझे इस बात पर गर्व है कि मैं 'मोदी भक्त' हूँ। क्यूंकि भक्त वही होता है जिसे अपने भगवान में विश्वास होता है। और इसमें कोई शक नहीं कि मेरी तरह ही भारत की 125 करोड़ जनता का विश्वास आपमें है और इसी विश्वास के कारण देश आज आपके नेतृत्व में प्रगति के पथ पर अग्रसर है।



प्रधानमंत्री जी, मैं ऐसे गाँव से ताल्लुक रखता हूँ जहाँ प्रत्येक घर में कम से कम दो सरकारी शिक्षक हैं।  मेरे दादाजी सेवानिवृत शिक्षक हैं और पिताजी भी वर्तमान में अध्यापन का ही कार्य कर रहे हैं। मेरे चार नानाजी में से तीन शिक्षक रह चुके हैं। मैंने भी पूर्व में ट्यूशन और कोचिंग के अलावा एक वर्ष तक सीबीएसई स्कूल में बतौर कम्प्यूटर टीचर के रूप में कार्य किया है। हम सभी इस बात से भलीभांति परिचित हैं कि किसी भी समाज और देश के निर्माण में सबसे अहम योगदान शिक्षा का होता है। और ये कहा भी

गया है कि ,"Education is the most powerful weapon in this world". लेकिन जिस तरीके से वर्तमान समय में देश की  शिक्षा पद्धति और प्रणाली में खामियां हैं उसे लेकर मैं बहुत चिंतित और दुखी हूँ और मैं समझता हूँ कि अगर हम सब को भारत को सुपरपावर बनाना है तो देश की  शिक्षा पद्धति और प्रणाली में बड़े बदलाव की आवश्यकता है। आज देश में शिक्षा एक कारोबार बन चूका है जिसके गंभीर नतीजे हमारे देश के लाखों युवाओं को इंजीनियरिंग और मैनेंजमेंट की भारी भरकम डिग्री लेने के बावजूद भी बेरोजगार रहने पर मजबूर कर रहे हैं।

आज अगर किसी परिवार की मासिक आय 5000 रुपया भी है तो वो अपने बच्चों का एडमिशन प्राइवेट स्कूल में करवाना चाहता है। ऐसा क्यों ? जबकि सरकारी स्कूलों में ज्यादा अनुभवी और कुशल शिक्षक मौजूद हैं। यह बरसों से सरकार द्वारा सरकारी स्कूलों की अनदेखी का नतीजा है। मेरा लगभग पूरा विद्यार्थी जीवन सरकारी स्कूलों में ही पढ़कर व्यतीत हुआ है। मगर आज बड़े दुःख के साथ यह लिखना पड़ रहा है कि मैं अपने गाँव के जिस प्राथमिक विद्यालय का छात्र रहा हूँ आज उस विद्यालय का कोई वजूद नहीं है। ये तस्वीर उसी विद्यालय की  है।




जब भी मैं इस रास्ते से गुजरता हूँ तो इस विद्यालय की जर्जर स्थिति को देखकर जो पीड़ा होती है उसे सिर्फ मैं ही महसूस कर सकता हूँ। 

सातवां वेतन आयोग लगने वाला है और इसके बाद सभी सरकारी शिक्षकों के वेतन में बड़ी  वृद्धि  होगी। लेकिन सरकार जो अरबों रूपए खर्च करती है उसका सदुपयोग क्यों नहीं हो पाता  है। 

इसी सन्दर्भ में भारत सरकार की 'मिड डे मील' योजना का जिक्र करना चाहूंगा। पिछले साल यह खबर आई की किसी विदेशी संस्था ने इसे विश्व की सबसे बड़ी योजना का नाम दिया है। लेकिन क्या उस विदेशी संस्था ने 'मिड डे मील' में बच्चों को परोसी जानेवाली 'खिचड़ी' का स्वाद चखा होगा ? मुझे तो नहीं लगता। हम सब को इस बात को स्वीकार करना होगा कि आज सरकारी स्कूलों में जो भी बच्चे        (विशेषकर ग्रामीण क्षेत्रों के ) पढ़ने जाते हैं उनमें पढाई
 की ललक कम  और  पेट भरने की ललक ज्यादा दिखती है। ग्रामीण क्षेत्रों में सरकारी स्कूलों में जाने वाले ये वही बच्चे होते हैं जिनके परिवार की आर्थिक स्थिति एकदम छिन्न-भिन्न है। 
अगर किसी घर में रोज़-रोज़ एक ही खाना बनता है जो कि स्वादिष्ट और माँ के हाथों का बना होता है , तो भी हम उस खाने से ऊब जाते हैं , और कुछ नया खाने की इच्छा रखते हैं। जरा सोचिये कि हमारे देश के नन्हे भविष्य हर दिन एक ही 'खिचड़ी' को कैसे खाते होंगे। वो भी उनके हाथों से बनी हुयी जिनके मासिक वेतन की चर्चा करने में भी मुझे शर्म आती है। 

हम बड़े ही गौरान्वित महसूस कर रहे होंगे की विश्व की सबसे बड़ी योजना का नाम 
'मिड डे मील' योजना है। लेकिन हकीकत की बात तो ये है कि विदेशी ताकतें यही तो चाहती हैं कि भारत के भविष्य का निर्माण करने वाले बच्चे मंदबुद्धि और शारीरिक रूप से कमजोर बनें। 
मैं अपने आप को इतना बड़ा तो नहीं समझता की आपको कोई सुझाव दे सकूँ लेकिन अनुरोध जरूर करना चाहूंगा की या तो 'मिड डे मील' योजना के ऊपर पूरी तरह से निगरानी किया जाये या फिर इसे तत्काल प्रभाव से बंद किया जाना चाहिए। 

ये तो बात हुयी समस्या की। अब बात करते हैं समाधान की। ऐसा नहीं है कि सरकार का ध्यान शिक्षा के प्रति नहीं है और सरकार पैसा खर्च नहीं करती है। बात है तो सिर्फ उस पैसे के नियंत्रण और निगरानी की। 'मिड डे मील' के पैसों को हड़पने में आज बेसिक शिक्षा अधिकारी से लेकर स्कूलों के प्रधानाध्यापक तक संलिप्त हैं।  अगर इस पर निगरानी की जाये तो शायद बच्चों को 'खिचड़ी' से ज्यादा और पौष्टिक आहार नसीब हो जाये। 

जितना पैसा 'मिड डे मील' योजना में खर्च होता है , मुझे लगता है कि उससे कम पैसों में ही ' डिजिटल इण्डिया ' कार्यक्रम के तहत देश के सभी सरकारी स्कूल कालेजों में CCTV कैमरे और इंटरनेट के माध्यम से डायरेक्ट मानव संसाधन विभाग से निगरानी रखी जा सकती है। दिल्ली में बैठकर देश की शिक्षा मंत्री नज़र रख सकती हैं कि कौन से स्कूल में पढ़ाई हो रही है और किस स्कूल में शिक्षक बैठकर गप्पे मार रहे हैं या शिक्षिका इस सर्दी के मौसम में अपने बेटे के लिए स्वेटर बुन रही हैं। अगर ऐसा हो गया तो बहुत ही सकारात्मक बदलाव देखने को मिलेंगे। 

दूसरा सबसे बड़ा बदलाव जो होना चाहिए वो ये है कि आठवीं कक्षा के बाद से ही स्टूडेंट्स को अपने रुचि और शिक्षक द्वारा मार्गदर्शन के आधार पर मनपसंद  विषय चुनने का अधिकार होना चाहिए। आज भारत में कोई भी नया शोध नहीं हो रहा है , उसका सबसे बड़ा कारण यह है कि हमारे यहाँ नर्सरी में एड्मिसन लेने वाले बच्चे के पीठ पर 5 K.G. का बस्ता लाद दिया जाता है जिसमें कमसे काम सात से दस विषय के किताब होते हैं। और उसमें भी माता -पिता चाहते हैं की हमारा बच्चा 90% से कम नंबर ना लाये। 

यहाँ पर एक घटना का जिक्र करना चाहूंगा। पिछले वर्ष एक सीबीएसई स्कूल में मैं कम्प्यूटर टीचर के रूप में कार्यरत था। एक दिन 5th standard में क्लास ले रहा था तो एक बच्ची से मैंने पूछा कि होमवर्क करके लायी हो ? 
उसने बोला ,"नहीं"। मैंने पूछा ,"क्यों "?
फिर उसने बड़े ही विनम्रतापूर्वक जवाब दिया ," सर, कल Maths, SST, English, Hindi, और Computer में होमवर्क मिला था।  मैंने सबका कर लिया बस Computer का ही रह गया , मेरे पास टाइम नहीं बच पाया था। "
मेरे पास उस स्टूडेंट के उत्तर का कोई प्रत्युत्तर नहीं था। 

आशा करता हूँ की मेरा ये पत्र आप तक पहुंचे और आपको विश्वास दिलाना चाहता हूँ कि भारत को फिर से विश्वगुरु बनाने में जो भी योगदान की जरुरत होगी वो मैं बिना किसी निजी स्वार्थ के करने में प्रयासरत रहूंगा। 

आपके आशीर्वाद की प्रतीक्षा में,
आपका अपना 
नीतिश तिवारी। 



5 comments:

  1. काश आप का पत्र मोदी जी पढ़ पाते...
    काश आप जो सोच रहे हैं, सत्य हो जाता...

    हम तो आशा कर सकते हैं...
    सुंदर....

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    1. माननीय प्रधानमंत्री जी तक इस पत्र को पहुँचाने की कोशिश जारी है .

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  2. काश आपना पात्र उनकी नजर हो जाये ...

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