Sunday, 15 March 2015

बैठा है एक पहरेदार.















अब और नहीं कर सकता मैं इंतज़ार ,
क्यूंकि मुझे हो गया है तुझसे प्यार,
तुम भी आ जाओ कर लो इकरार ,
नहीं तो फिर से आ जायेगा वो इतवार। 

दुनिया मुझे कहती है मोहब्बत में बीमार,
क्यूंकि साथ मिला है तेरा मुझे बेशुमार ,
तेरे दरवाज़े पे बैठा है एक पहरेदार,
हम कैसे जा पाएंगे छोड़कर घर-बार। 

© नीतीश तिवारी 

6 comments:

  1. आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल सोमवार (16-03-2015) को "जाड़ा कब तक है..." (चर्चा अंक - 1919) पर भी होगी।
    --
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
    --
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ...
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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    1. मेरी रचना चर्चा मंच पर शामिल करने के लिए आपका धन्यवाद

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  2. प्रेम में सब कुछ करना पड़ता है ... पहरेदार हो तो भी जाना होता है ...

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    1. जी बिल्कुल सही कहा आपने...आपका शुक्रिया.

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