Saturday, 4 October 2014

वो कयामत थी या...



















घर से बाहर जब मैं धूप में निकला,
सारा खजाना उसकी संदूक में निकला,
कहता फिरता था की मैं पाक साफ हूँ,
दुनिया का सबसे बड़ा रसूख वो निकला.

ना मोहब्बत थी ना मैने होने दी,
फिर भी उसकी नज़र में शरीफ ना निकला,
वो कयामत थी या ना जाने खुदा,
हर चेहरा उसकी उम्मीद में निकला.


नीतीश तिवारी

9 comments:

  1. बहुत सुन्दर प्रस्तुति।
    --
    आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल रविवार (05-10-2014) को "प्रतिबिंब रूठता है” : चर्चा मंच:1757 पर भी होगी।
    --
    चर्चा मंच के सभी पाठकों को
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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  2. खूब! बहुत खूब! हाले दिल ...

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    1. शुक्रिया कविता जी

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  3. Bahut khoob prastuti. Dusari aur chouthy pnkti lajawaab thi !zb

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  4. एक नए अंदाज एवं शैली में प्रस्तुत आपकी पोस्ट अच्छी लगी। मेरे नए पोस्ट पर आपका इंतजार रहेगा।धन्यवाद।

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