Monday, 18 June 2018

रात की तन्हाईयाँ।















रात की तन्हाईयाँ
और तुम्हारी खामोशियाँ
दोनो एक साथ 
मौजूद क्यों हैं।

ये कैसा सितम है
मुझ पर
या कोई ज़ुल्म
किया है हालात ने।

खयालों के ख्वाब
बुनते-बुनते
मैं थक सा गया हूँ
भीड़ में तुम्हें
ढूंढते-ढूंढते
मैं थक सा गया हूँ।

मशाल की तलाश है
पर एक चिंगारी भी
मौजूद नहीं
मैं तुझको कैसे भुला दूँ
ये समझदारी भी
मौजूद नहीं।

©नीतिश तिवारी।

1 comment:

  1. बुलाना क्यों जिसे याद किया ...
    दिल में संजोया चाहिए ...

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