Thursday, 26 January 2017

मेरा वज़ूद।












मुझको मेरे वज़ूद का होना अब खलता है,
पर ऐसे ही तो ज़िन्दगी का खेल चलता है।

आज मौजूद नहीं है हीरे को तराशने वाला जौहरी,
ये कौन सा दौर है जिसमें शीशा भी पिघलता है।

लोग तो बहुत मिलते हैं सफर में हमसफर बनने वाले,
पर मुश्किल हालात में कहाँ कोई साथ चलता है।

ख्वाहिशों की बलि देकर ज़िन्दगी को संवारा है मैंने,
पर मंज़िल पाने को अब भी ये दिल मचलता है।

मैं किसे चाहूँ, किसके लिए अब सज़दा करूँ,
ये वक़्त भी मतलबी हो गया, हर पल बस बदलता है।


©नीतिश तिवारी।


No comments:

Post a Comment