Monday, 10 October 2016

प्यार, इकरार और बेवफा यार।























दस्तक जो हुई उसकी मेरे दर पर यूँ अचानक से,
धड़कन बढ़ने लगी मेरी उसकी आँखों की शरारत से,
मोहब्बत की ऐसी लागी है लगन की मचल उठा है मेरा मन,
इबादत मेरी पूरी हुई अब खुदा की इनायत से।

इन गिरते हुए आंसुओं से अपने दामन को बचाऊँ कैसे,
ज़ख्म जो तूने दिया है मोहब्बत में उसे दिखाऊँ कैसे,
कभी आरज़ू नहीं की मैंने बादशाह बनने की,
इस मोहब्बत में फ़कीरी की दास्तान सुनाऊँ कैसे।

फिर से आ जाओ बेवफाई का तीर लेकर,
मोहब्बत के जंग में मैं निहत्थे उतरा हूँ।

©नीतिश तिवारी।


1 comment:

  1. आपको सूचित करते हुए हर्ष हो रहा है कि- आपकी इस प्रविष्टि के लिंक की चर्चा कल मंगलवार (11-10-2016) के चर्चा मंच "विजयादशमी की बधायी हो" (चर्चा अंक-2492) पर भी होगी!
    श्री राम नवमी और विजयादशमी की हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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