Thursday, 27 October 2016

नया किरदार बनके उभरा हूँ मैं ।
















मुझे आशिकी की लत् तो नहीं थी।
बस खो गए थे तेरी निगाहों में।।

वो सफर भी कितना हसीन था।
जब सो गए थे हम तेरी बाहों में।।

वक़्त गुजरा मोहब्बत मुक्कमल हुई।
मेरी साँस घुल गयी थी तेरी साँसों में।।

बड़ी आसान लगने लगी मंज़िल मेरी।
तूने मखमल जो बिछाये मेरी राहों में।।

फुर्सत नहीं मुझे दिल्लगी से अब।
हर वक़्त रहता हूँ तेरे खयालों में।।

नया किरदार बनके उभरा हूँ मैं अब।
क्या खूब तराशा है तूने मुझे।।

©नीतिश तिवारी।

Monday, 10 October 2016

प्यार, इकरार और बेवफा यार।























दस्तक जो हुई उसकी मेरे दर पर यूँ अचानक से,
धड़कन बढ़ने लगी मेरी उसकी आँखों की शरारत से,
मोहब्बत की ऐसी लागी है लगन की मचल उठा है मेरा मन,
इबादत मेरी पूरी हुई अब खुदा की इनायत से।

इन गिरते हुए आंसुओं से अपने दामन को बचाऊँ कैसे,
ज़ख्म जो तूने दिया है मोहब्बत में उसे दिखाऊँ कैसे,
कभी आरज़ू नहीं की मैंने बादशाह बनने की,
इस मोहब्बत में फ़कीरी की दास्तान सुनाऊँ कैसे।

फिर से आ जाओ बेवफाई का तीर लेकर,
मोहब्बत के जंग में मैं निहत्थे उतरा हूँ।

©नीतिश तिवारी।


Saturday, 1 October 2016

हमें नहीं आता...




















अपनी हसरतों पर लगाम लगाने हमें नहीं आता,
उसकी मोहब्बतों का कलाम सुनाने हमें नहीं आता।

कश्ती अगर साथ छोड़ दे जिसका बीच भँवर में,
ऐसे समंदर को सलाम करने हमें नहीं आता।

जलते हुए खूबसूरत चिराग को बुझाने हमें  नहीं आता,
किसी के घर की रौशनी को मिटाने हमें नहीं आता।

पर्दे के पीछे यूँ सियासत करने हमें नहीं आता,
चुपके से महबूबा का घूँघट उठाने हमें नहीं आता।

पैमाने के ज़ाम को आधा छोड़ देना हमें नहीं आता,
मयखाने में यूँ अकेले महफ़िल जमाना हमें नहीं आता।

देखिए ना, सफ़र में कितनी धूप है, छाँव का नामो निशान नहीं,
बिना काँटों के मंज़िल तक पहुँचना हमें  नहीं आता।

©नीतिश तिवारी।