Wednesday, 14 September 2016

प्यार का करंट-बिजली के नाम बिरजू का लेटर।





















माई डियर
      बिजली।

आशा है कि तुम पहले की तरह सबकी जिंदगी में प्यार का करंट दौड़ा रही होगी। आज तुम्हारी शादी की पहली सालगिरह है और हमारे बिछड़ने का भी। समझ नहीं आ रहा है कि मैं तुम्हे ये खत्त क्यों लिख रहा हूँ। तुम्हें मुबारकबाद देने के लिए या अपने आप को सजा देने के लिए। हमें बिछड़े हुए एक साल हो गए लेकिन तुम्हारे प्यार में मिले हुए झटके से अभी तक उबर नहीं पाया हूँ।

याद है बिजली, कॉलेज का वो पहला दिन जब हम मिले थे। तुम गुलाबी सलवार कमीज़ में एकदम पटाखा लग रही थी और मैं एक माचिस के तिल्ली जैसा पतला था। तूने अपनी आँखों में ढेर सारा काजल लगाया था कि किसी की नज़र ना लगे। लेकिन मेरे अंदर बारूद जो भरा था, सो हो गया विस्फोट।

याद है बिजली, जब तुम रोज शाम को गाँव के पीछे वाली नहर पर मिलने आया करती थी। मैं तुझसे बार बार कहता था कि खुले बालों में आया कर और तुम मुझे चिढ़ाने के लिए चुटिया बनाकर आ जाती थी। रोज शाम को ढलते सूरज के साथ हमारा प्यार बढ़ता ही जा रहा था। फिर रात को मैं तेरी यादों को सिरहाने लेकर किसी तरह सो पाता था।

याद है बिजली, जब कॉलेज के बाद बार बार तुम शर्मा जी के गोलगप्पे खाने की ज़िद करती थी। लेकिन मेरा मन वर्मा जी की बरफी खाने का होता था। अफसोस हम कभी एक साथ गोलगप्पे और बरफी खा नहीं पाए क्योंकि दोनो दुकानें दूर दूर जो थीं। पर मैं अब भी शर्मा जी के दुकान से तुम्हारे हिस्से के गोलगप्पे खाता हूँ। मुझे पूरा उम्मीद है कि तू भी मेरे हिस्से का बरफी अपने नए घर में खाती होगी।

अब ना वो कॉलेज है, ना वो नहर के किनारे की यादें। पर एक बात का गुरुर जरूर है मुझे कि मेरी बिजली भले ही किसी और की हो चुकी है लेकिन तेरी यादों का करंट हमेशा मुझे उन दिनों की याद दिला देता है।
तुझे बेवफा का इल्ज़ाम तो नहीं दे सकता क्योंकि जितने दिन तूने वफ़ा निभाई बड़ी शिद्दत से निभाई।

तुझसे मिलने के इंतज़ार में,
तुम्हारा आशिक़,
बिरजू।

काव्य के बाद गद्य में मेरा ये छोटा सा प्रयास। रचना पढ़ने के लिए आपका धन्यवाद।
© नीतिश तिवारी।

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