Friday, 5 August 2016

मोहब्बत, सावन और वो।
























मेरे नाम का सिंदूर है उसकी माँग में,
उसने हाथों में मेंहदी रचाई है मेरे लिए,
जब जब धड़कता है मेरा दिल उसके लिए,
बजती है उसकी पायल सिर्फ मेरे लिए,


तो कैसे ना करूँ मोहब्बत उस दिलरुबा से,
क्यों ना पूजूँ मैं अपनी अर्धांगिनी को,
जब इस सावन में मोहब्बत बरस रही है खुलकर,
क्यों न भींग जाऊं आज मैं जी भरकर।

©नीतिश तिवारी

4 comments:

  1. आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल रविवार (07-08-2016) को "धरा ने अपना रूप सँवारा" (चर्चा अंक-2427) पर भी होगी।
    --
    हरियाली तीज और नाग पञ्चमी की
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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    1. बहुत बहुत धन्यवाद।

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  2. क्यों नहीं प्यार से ही प्यार बढ़ता है
    बहुत सुन्दर

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    1. बिल्कुल सही कहा आपने। आपका शुक्रिया।

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