Sunday, 14 August 2016

और आज़ादी मना रहे हैं हम।
















देश का हुआ बुरा हाल है,
गरीब अपनी दशा पर बेहाल है,
और आज़ादी मना रहे हैं हम।

ये कैसी आज़ादी और किसकी आज़ादी?
बहू बेटियों पर हो रहा अत्याचार है,
हैवानियत का जूनून सब पर सवार है,
इंसानियत हो रही शर्मशार है,
आँखें मूंदकर सो रही सरकार है।
और आज़ादी मना रहे हैं हम।

रोटी पानी बिजली अभी तक ना मिली,
दाने दाने को मोहताज परिवार है,
चारों तरफ फैला सिर्फ भ्र्ष्टाचार है,
पढ़े लिखे युवा भी बेरोजगार हैं।
और आज़ादी मना रहे हैं हम।

देशद्रोहियों का बढ़ रहा ब्यापार है,
आतंकियों के समर्थन में उतरे हजार हैं,
वीर सपूतों को कर रहे दरकिनार हैं,
ऐसी आज़ादी पर हमें धिक्कार है।

©नीतिश तिवारी।



4 comments:

  1. आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल मंगलवार (16-08-2016) को "एक गुलाम आजाद-एक आजाद गुलाम" (चर्चा अंक-2436) पर भी होगी।
    --
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
    --
    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
    --
    ७० वें स्वतन्त्रता दिवस की
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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    1. मेरी रचना शामिल करने के लिए आपका बहुत बहुत धन्यवाद।

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  2. सच है आज़ादी के सही मायने नहीं मिले हैं हमें ... भावपूर्ण ...

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