Monday, 1 August 2016

नए दौर का नया आशिक़।




परत दर परत निकल रहा हूँ मैं।
अपने ज़ख्मों से अब उबर रहा हूँ मैं।।

तूने जिन राहों में बिछाये थे कांटें मेरे लिए।
अब उन राहों से नहीं गुजर रहा हूँ मैं।।

फूलों की सेज सजी है, हर फ़िज़ा में बहार है।
इन मदमस्त हवाओं के साथ गुजर रहा हूँ मैं।।

वक़्त के खेल को हम बखूबी समझ गए थे।
पर इस वक़्त से आगे अब निकल रहा हूँ मैं।।

तेरी बेवफाई ने घायल किया पर हौंसला ना रुका।
फिर से नई मोहब्बत अब कर रहा हूँ मैं।।

धड़कन करती पुकार है साँसों में भी खुमार है।
नए दौर का नया आशिक़ अब बन रहा हूँ मैं।।

©नीतिश तिवारी।

1 comment:

  1. आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल बुधवार (03-08-2016) को "हम और आप" (चर्चा अंक-2423) पर भी होगी।
    --
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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