Monday, 29 August 2016

दिल के जज़्बात





खुले आसमान में मैं अपने ख्वाब बुनता रहा,
तेरी यादों के सहारे मैं उस रात जागता रहा,
कयामत आ जाती तो मैं स्वीकार कर लेता पर,
अफसोस, पतंग भी उड़ती रही और डोर भी कटता रहा।


फुर्सत के पल और उसकी धुंधली यादें,
बार बार नजर आती हैं उसकी कातिल निगाहें,
करता हूँ इंतज़ार अब भी फैलाएँ अपनी बाहें,
एक दिन वो आएगी और पूरी होंगी मेरी दुआएं।

©नीतिश तिवारी।

Sunday, 14 August 2016

और आज़ादी मना रहे हैं हम।
















देश का हुआ बुरा हाल है,
गरीब अपनी दशा पर बेहाल है,
और आज़ादी मना रहे हैं हम।

ये कैसी आज़ादी और किसकी आज़ादी?
बहू बेटियों पर हो रहा अत्याचार है,
हैवानियत का जूनून सब पर सवार है,
इंसानियत हो रही शर्मशार है,
आँखें मूंदकर सो रही सरकार है।
और आज़ादी मना रहे हैं हम।

रोटी पानी बिजली अभी तक ना मिली,
दाने दाने को मोहताज परिवार है,
चारों तरफ फैला सिर्फ भ्र्ष्टाचार है,
पढ़े लिखे युवा भी बेरोजगार हैं।
और आज़ादी मना रहे हैं हम।

देशद्रोहियों का बढ़ रहा ब्यापार है,
आतंकियों के समर्थन में उतरे हजार हैं,
वीर सपूतों को कर रहे दरकिनार हैं,
ऐसी आज़ादी पर हमें धिक्कार है।

©नीतिश तिवारी।



Friday, 5 August 2016

मोहब्बत, सावन और वो।
























मेरे नाम का सिंदूर है उसकी माँग में,
उसने हाथों में मेंहदी रचाई है मेरे लिए,
जब जब धड़कता है मेरा दिल उसके लिए,
बजती है उसकी पायल सिर्फ मेरे लिए,


तो कैसे ना करूँ मोहब्बत उस दिलरुबा से,
क्यों ना पूजूँ मैं अपनी अर्धांगिनी को,
जब इस सावन में मोहब्बत बरस रही है खुलकर,
क्यों न भींग जाऊं आज मैं जी भरकर।

©नीतिश तिवारी

Monday, 1 August 2016

नए दौर का नया आशिक़।




परत दर परत निकल रहा हूँ मैं।
अपने ज़ख्मों से अब उबर रहा हूँ मैं।।

तूने जिन राहों में बिछाये थे कांटें मेरे लिए।
अब उन राहों से नहीं गुजर रहा हूँ मैं।।

फूलों की सेज सजी है, हर फ़िज़ा में बहार है।
इन मदमस्त हवाओं के साथ गुजर रहा हूँ मैं।।

वक़्त के खेल को हम बखूबी समझ गए थे।
पर इस वक़्त से आगे अब निकल रहा हूँ मैं।।

तेरी बेवफाई ने घायल किया पर हौंसला ना रुका।
फिर से नई मोहब्बत अब कर रहा हूँ मैं।।

धड़कन करती पुकार है साँसों में भी खुमार है।
नए दौर का नया आशिक़ अब बन रहा हूँ मैं।।

©नीतिश तिवारी।