Wednesday, 20 July 2016

नक़ाब पहने बैठे हैं।





कल उसकी आँखों में अपनी तस्वीर नजर आयी।
ज़ुल्म देखिए आज वो नक़ाब पहने बैठे हैं।।

फिर जिंदगी की एक नई शुरुआत होने को है,
सूखे बंजर में बरसात होने को है, 
तड़पता रहा उम्र भर जिस शख्स के खातिर,
उस शख्स से आज मुलाकात होने को है।

ख्वाहिशें अगर तुमसे हैं जिंदा तो चल साथ मेरे,
तेरे हर धड़कन की इबादत अब मैं करूँगा,
रंजिशें हैं जमाने में अगर हमारी मोहब्बत के खातिर,
तो मरते दम तक इस जमाने से मैं लड़ूंगा।

©नीतिश तिवारी।

8 comments:

  1. आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल गुरूवार (21-07-2016) को "खिलता सुमन गुलाब" (चर्चा अंक-2410) पर भी होगी।
    --
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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  2. आपका बहुत बहुत धन्यवाद सर।

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  3. आपकी लिखी रचना आज "पांच लिंकों का आनन्द में" गुरुवार 21 जुलाई 2016 को लिंक की गई है.... http://halchalwith5links.blogspot.in पर आप भी आइएगा....धन्यवाद!

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  4. Replies
    1. शुक्रिया सुमन जी।

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  5. प्रेम को नए आयाम देती रचना ... बहुत खूब ...

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