Saturday, 25 June 2016

लो अच्छे दिन आ गए।










क़र्ज़ में डूबा किसान,
इंसान बना अब हैवान,
सो रहे हैं हुक्मरान,
लो अच्छे दिन आ गए।

जी भर के की मैंने पढ़ाई,
मास्टर डिग्री भी मैंने पाई,
पर नौकरी नहीं मिली भाई,
लो अच्छे दिन आ गए।

महंगाई का हुआ है ऐसा हाल,
थाली से गायब हुए सब्ज़ी दाल,
जनता किससे करे जवाब सवाल,
लो अच्छे दिन आ गए।

नेता को काम की फिक्र नहीं,
चुनावी वादों का कोई जिक्र नहीं,
हो रही है डिग्री की पड़ताल,
लो अच्छे दिन आ गए।

लोग तो हर साँस में बसे थे,
मैं भी उनकी खुशबू बन गया था,
एक आईना टूटा सब बिखर गया,
लो अच्छे दिन आ गए।

©नीतिश तिवारी।

9 comments:

  1. आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल रविवार (26-06-2016) को "लो अच्छे दिन आ गए" (चर्चा अंक-2385) पर भी होगी।
    --
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
    --
    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
    --
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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  2. सुन्दर रचना

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  3. सुंदर व्याख्या
    बधाई..

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  4. सुंदर व्याख्या
    बधाई..

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  5. अच्छे दिन तो इस एहसास से ही आ गए की कुछ काम तो हो रहा है ...
    अच्छी रचना है ...

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