Sunday, 15 May 2016

जिंदगी फिर से...



एक बार फलक पर आ जाने तो दो,
इन चाँद सितारों का साथी बन जाने तो दो,
सलामी की ख्वाहिश नहीं बस याद रखना हमें,
एक बार आपकी दुआओं में शामिल हो जाने तो दो।

क्यों ना देखूँ मैं ख्वाब सब कुछ पाने का,
ये जीवन ही तो है सारे ग़मों को भूल जाने का,
कतरा कतरा आंसू बहे, लम्हा लम्हा ज़िन्दगी थमी,
फिर भी ढूंढ लिया है मैंने एक बहाना जीने का।

©नीतिश तिवारी।

3 comments:

  1. आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल सोमवार (16-05-2016) को "बेखबर गाँव और सूखती नदी" (चर्चा अंक-2344) पर भी होगी।
    --
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
    --
    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
    --
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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  2. धन्यवाद सर।

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  3. सुन्दर व सार्थक रचना प्रस्तुतिकरण के लिए आभार!

    मेरे ब्लॉग की नई पोस्ट पर आपका स्वागत है...

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