Saturday, 28 February 2015

मैं ग़ज़ल लिखता हूँ.

















फ़ुर्सत में मैं ग़ज़ल लिखता हूँ,
तेरी यादों का एक सफ़र लिखता हूँ.

वो वक़्त जो थम सा गया था कभी,
उस वक़्त की रगुजर लिखता हूँ.

काली घटा और तेरी ज़ुल्फ़ो के बीच,
गुजरा हुआ वो मौसम लिखता हूँ.

हर एक रंग में और तेरे संग में,
सपनो का एक शहर लिखता हूँ.

कुछ बदहाली में तो कुछ खुशहाली में,
ज़िंदगी का ये भ्रम लिखता हूँ.

तेरी खुश्बू में और तेरी जूस्तजू में,
अपने होने का वो वहम लिखता हूँ.

तेरी धड़कन में और तेरी तड़पन में,
अपने साँसों का वो सितम लिखता हूँ.

तेरी आवारगी में और तेरी दीवानगी में,
भटकते राहों का मंज़िल लिखता हूँ.

फ़ुर्सत में मैं ग़ज़ल लिखता हूँ,
तेरी यादों का एक सफ़र लिखता हूँ.


अगर आपको मेरी ये ग़ज़ल पसंद आई हो तो शेयर ज़रूर कीजिए.
धन्यवाद.



©नीतीश तिवारी



10 comments:

  1. सार्थक प्रस्तुति।
    --
    आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल सोमवार (02-03-2015) को "बदलनी होगी सोच..." (चर्चा अंक-1905) पर भी होगी।
    --
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
    --
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ...
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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    1. आपका आभार मयंक जी

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    1. धन्यवाद सर जी

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  3. बहुत खूब ... लाजवाब शेर हैं ग़ज़ल के ...

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    1. आपका शुक्रिया

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  4. वाह, वाह क्‍या बात है। बहुत खूब।

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