Saturday, 11 January 2014

एक नज़र इधर भी।



तेरे शहर का मिज़ाज़ देखा ,
लोग बदनाम हैं एक नाम के खातिर। 

उन परिंदो के पैर अब तक भटकते है ,
शायद उनका आशियाना अब भी अधूरा है। 

साँझ ढलते ही दिल में एक तलब सी जगती है ,
रात में किसी परी का इंतज़ार हो जैसे। 

तुम्हे आज़माने कि ख्वाहिश है तो किसी और से मिल ,
मेरे दिल के जज्बात अब खैरात नहीं रहे। 

प्यार के साथ 
आपका नीतीश 

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