Sunday, 24 November 2013

कुछ डायरी के पन्नों से















मत छीन सुकून मेरा इन आँखों से,
तेरे दीदार का सिर्फ़ ये ही एक सहारा है .

अगर अंज़ाम की फ़िक्र होती तो मोहब्बत ना करते,
हमें तो तेरे आगाज़ ने ही तन्हा बना दिया .

उलफत के वादों को तुमने निभाया ही नही,
और कहते हो की तेरा ज़िक्र आया ही नही,
गैरों का दामन थामते रहे ज़िंदगी भर,
और शिकायत है कि तुमने अपनाया ही नही.

तेरी आशिकी ने मेरी तबीयत बिगाड़ दी है ,
किससे दवा लूँ या किसकी दुआ लूँ पता नही.

1 comment:

  1. शीर्षक ही शानदार लगा …… रचना के तो क्या कहने |

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