Wednesday, 20 November 2013

तेरी मोहब्बत ने शायर बना दिया।



                    हमें आदत थी पत्थर के मकानों में ठहरने  की,
                    कभी एहसास ही नहीं हुआ कि दिल सीसे का बना है। 

                    हमारी मोहब्बत का बस इतना सा पैगाम था ,
                    वक़्त -बे -वक़्त उसका मुझ पर ही इलज़ाम था। 

                    ज़माना यूँ तो नाराज़ नहीं था मुझसे पहले कभी ,
                    एक तेरी मोहब्बत के खातिर आज सबके बैरी हो गए। 

                    न जाने  कौन सी दवा दे गया था वो हक़ीम ,
                    न ही वो पास आती है, न ही ये मर्ज़  दूर जाता है। 

                    अब मेरे कलम कि दिवानगी रोके नहीं रूकती ,
                    इस मोहब्बत ने हमें भी शायर बना दिया। 

11 comments:

  1. आपकी इस प्रस्तुति का लिंक 21-11-2013 की चर्चा में है
    कृपया चर्चा मंच पर पधारें
    धन्यवाद

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    1. आपका बहुत बहुत आभार

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  2. शायरी मोहब्बत की बहुत सुन्दर |

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  3. बढ़िया ग़ज़ल......

    अनु

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    1. शुक्रिया अनु जी

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  4. भीतर से जो मोम हैं, बाहर से पाषाण।
    इन्हीं पत्थरों में कहीं, रमें हुए भगवान।

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  5. वाह!वाह!वाह!..कितना सुन्दर कहा है..

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